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Table of Contents
                            1.   विद्यार्थियों, माता-पिता-अभिभावकों व राष्ट्र के कर्णधारों के नाम ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आसारामजी बापू का संदेश
2.   यौवन-सुरक्षा
	ब्रह्मचर्य क्या है ?
	ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट तप है
	वीर्यरक्षण ही जीवन है
	आधुनिक चिकित्सकों का मत
	वीर्य कैसे बनता है
	आकर्षक व्यक्तित्व का कारण
	माली की कहानी
	सृष्टि क्रम के लिए मैथुन : एक प्राकृतिक व्यवस्था
	सहजता की आड़ में भ्रमित न होवें
	अपने को तोलें
	मनोनिग्रह की महिमा
	आत्मघाती तर्क
	स्त्री प्रसंग कितनी बार ?
	राजा ययाति का अनुभव
	राजा मुचकन्द का प्रसंग
	गलत अभ्यास का दुष्परिणाम
	
	वीर्यरक्षण सदैव स्तुत्य
	अर्जुन और अंगारपर्ण गंधर्व
	ब्रह्मचर्य का तात्त्विक अर्थ
3.   वीर्यरक्षा के उपाय
	सादा रहन-सहन बनायें
	उपयुक्त आहार
	शिश्नेन्द्रिय स्नान
	उचित आसन एवं व्यायाम करो
	
	ब्रह्ममुहूर्त में उठो
	दुर्व्यसनों से दूर रहो
	सत्संग करो
	शुभ संकल्प करो
	त्रिबन्धयुक्त प्राणायाम और योगाभ्यास करो
	नीम का पेड चला
	स्त्री-जाति के प्रति मातृभाव प्रबल करो
	शिवाजी का प्रसंग
	अर्जुन और उर्वशी
वीर्यसंचय के चमत्कार
	भीष्म पितामह और  वीर  अभिमन्यु
	पृथ्वीराज चौहान क्यों हारा ?
	स्वामी रामतीर्थ का अनुभव
	युवा वर्ग से दो बातें
	हस्तमैथुन का दुष्परिणाम
	अमेरिका में किया गया प्रयोग
	कामशक्ति का दमन या ऊर्ध्वगमन  ?
	एक साधक का अनुभव
	दूसरे साधक का अनुभव
	योगी का संकल्पबल
	क्या यह चमत्कार है ?
	हस्तमैथुन व स्वप्नदोष से कैसे बचें
	सदैव प्रसन्न रहो
	वीर्य का ऊर्ध्वगमन क्या है ?
	वीर्यरक्षा का महत्त्वपूर्ण प्रयोग
	दूसरा प्रयोग
	वीर्यरक्षक चूर्ण
	गोंद का प्रयोग
	तुलसी: एक अदभुत औषधि
ब्रह्मचर्य रक्षा हेतु मंत्र
पादपश्चिमोत्तानासन

हमारे अनुभव
	महापुरुष के दर्शन का चमत्कार
‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक आज के युवा वर्ग के लिये एक अमूल्य भेंट है
‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक नहीं, अपितु एक शिक्षा ग्रन्थ है
ब्रह्मचर्य ही जीवन है
शास्त्रवचन
भस्मासुर क्रोध से बचो
                        
Document Text Contents
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वासना की िनविृत के िलये, अतंःकरण की शुिि के िलये, ईशर की पािप के िलये, सखुी जीवन
जीने के िलये, अपने मनुषय जीवन के सवोचच लकय को पाप करने के िलये या कहो परमाननद
की पािप के िलये… कुछ भी हो, वीयरय कणरपी सािना सदैव अब अवसथाओं मे उतम है, शषे है
और आवशयक है |


वीयरय कण कैसे हो, इसके िलये यहाँ हम कुछ सथूल और सूकम उपायो की चचा य करेगे |


3. वी ययरका के उपा य

सा दा रहन -सहन ब ना ये
काफी लोगो को यह भम है िक जीवन तडक-भडकवाला बनाने से वे समाज मे िवशेि माने
जाते है | वसतुतः ऐसी बात नहीं है | इससे तो केवल अपने अहंकार का ही पदशनय होता है | लाल
रंग के भडकीले एवं रेशमी कपडे नहीं पहनो | तेल-फुलेल और भाँित-भािँत के इतो का पयोग करन े
से बचो | जीवन मे िजतनी तडक-भडक बढेगी, इिनियाँ उतनी चंचल हो उठेगी, िफर वीयरय का तो
दरू की बात है |


इितहास पर भी हम दिष डाले तो महापुरि हमे ऐसे ही िमलेगे, िजनका जीवन पारंभ से ही
सादगीपूण य था | सादा रहन-सहन तो बडपपन का दोतक है | दसूरो को देख कर उनकी अपाकृितक
व अििक आवशयकताओंवाली जीवन-शलैी का अनुसरण नहीं करो |

उपय ुि आ हार
ईरान के बादशाह वहमन ने एक शषे वैद से पूछा :
“िदन मे मनुषय को िकतना खाना चािहए?”
“सौ िदराम (अथातय ्31 तोला) | “वैद बोला |
“इतने से कया होगा?” बादशाह ने िफर पूछा |
वैद ने कहा : “शरीर के पोिण के िलये इससे अििक नहीं चािहए | इससे अििक जो कुछ
खाया जाता है, वह केवल बोझा ढोना है और आयुषय खोना है |”


लोग सवाद के िलये अपने पेट के साथ बहुत अनयाय करते है, ठँूस-ठँूसकर खाते है | यूरोप का
एक बादशाह सवािदष पदाथ य खूब खाता था | बाद मे औििियो दारा उलटी करके िफर से सवाद
लेने के िलये भोजन करता रहता था | वह जिदी मर गया |

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आप सवादलोलुप नहीं बनो | िजहा को िनयंतण मे रखो | कया खाये, कब खाय,े कैसे खाय े और
िकतना खाये इसका िववेक नहीं रखा तो पेट खराब होगा, शरीर को रोग घेर लेगे, वीयनय ाश को
पोतसाहन िमलेगा और अपने को पतन के रासते जाने से नहीं रोक सकोगे |


पेमपूवकय , शातं मन से, पिवत सथान पर बठै कर भोजन करो | िजस समय नािसका का
दािहना सवर (सूय य नाडी) चालू हो उस समय िकया भोजन शीघ पच जाता है, कयोिक उस समय
जठरािगन बडी पबल होती है | भोजन के समय यिद दािहना सवर चालू नहीं हो तो उसको चालू
कर दो | उसकी िविि यह है : वाम कुिक मे अपने दािहने हाथ की मुिठी रखकर कुिक को जोर
से दबाओ या बाँयी (वाम) करवट लेट जाओ | थोडी ही देर मे दािहना याने सूय य सवर चालू हो
जायेगा |


राित को बाँयी करवट लेटकर ही सोना चािहए | िदन मे सोना उिचत नहीं िकनतु यिद सोना
आवशयक हो तो दािहनी करवट ही लेटना चािहए |


एक बात का खूब खयाल रखो | यिद पेय पदाथ य लेना हो तो जब चनि (बाँया) सवर चालू हो
तभी लो | यिद सयू य (दािहना) सवर चालू हो और आपने दिू, काफी, चाय, पानी या कोई भी पेय
पदाथ य िलया तो वीयनय ाश होकर रहेगा | खबरदार ! सयू य सवर चल रहा हो तब कोई भी पेय पदाथय
न िपयो | उस समय यिद पेय पदाथ य पीना पडे तो दािहना नथुना बनद करके बाँये नथुने से शास
लेते हुए ही िपयो |


राित को भोजन कम करो | भोजन हिका-सुपाचय हो | बहुत गमय-गम य और देर से पचने वाला
गिरष भोजन रोग पैदा करता है | अििक पकाया हुआ, तेल मे तला हुआ, िमचय-मसालेयुि, तीखा,
खटटा, चटपटेदार भोजन वीयनय ािडयो को कुबि करता है | अििक गम य भोजन और गम य चाय से
दाँत कमजोर होते है | वीय य भी पतला पडता है |


भोजन खूब चबा-चबाकर करो | थके हुए हो तो ततकाल भोजन न करो | भोजन के तुरंत बाद
पिरशम न करो |


भोजन के पहले पानी न िपयो | भोजन के बीच मे तथा भोजन के एकाि घंटे के बाद पानी
पीना िहतकर होता है |


राित को सभंव हो तो फलाहार लो | अगर भोजन लेना पडे तो अिपाहार ही करो | बहुत रात
गये भोजन या फलाहार करना िहतावह नहीं है | कबज की िशकायत हो तो 50 गाम लाल िफटकरी
तवे पर फुलाकर, कूटकर, कपडे से छानकर बोतल मे भर लो | राित मे 15 गाम सौफ एक िगलास

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“जब कभी भी आपके मन मे अशुि िवचारो के साथ िकसी सी के सवरप की किपना उठे तो
आप ‘ॐ द ुगा य देवय ै नमः ’ मतं का बार-बार उचचारण करे और मानिसक पणाम करे |”

-िशवान ंदजी
“जो िवदाथी बहचय य के दारा भगवान के लोक को पाप कर लेते है, िफर उनके िलये ही वह
सवग य है | वे िकसी भी लोक मे कयो न हो, मुि है |”

-छानदोगय उपिनिद


“बुििमान ् मनुषय को चािहए िक वह िववाह न करे | िववािहत जीवन को एक पकार का दहकते
हुए अगंारो से भरा हुआ खडडा समझे | सयंोग या संसग य से इिनियजिनत जान की उतपित होती
है, इिनिजिनत जान से ततसंबंिी सुख को पाप करने की अिभलािा दढ होती है, ससंग य से दरू
रहने पर जीवातमा सब पकार के पापमय जीवन से मिु रहता है |”

-महातमा ब ुि


भगृुवशंी ॠिि जनकवंश के राजकुमार से कहते है :
मनोऽप ितकूलािन प ेतय च ेह च वा ंछ िस |

भूताना ं पित कूलेभयो िनव तयसव यत ेिनिय ः ||


“यिद तमु इस लोक और परलोक मे अपने मन के अनुकूल वसतुएँ पाना चाहते हो तो अपनी
इिनियो को सयंम मे रखकर समसत पािणयो के पितकूल आचरणो से दरू हट जाओ |”
–महाभारत म े मोक िम य पवय: 3094


भसमास ुर िोि से बचो
काम, िोि, लोभ, मोह, अहंकार- ये सब िवकार आतमानंदरपी िन को हर लेनेवाले शतु है |

उनमे भी िोि सबसे अििक हािनकता य है | घर मे चोरी हो जाए तो कुछ-न-कुछ सामान बच
जाता है, लेिकन घर मे यिद आग लग जाये तो सब भसमीभूत हो जाता है | भसम के िसवा कुछ
नही बचता |



इसी पकार हमारे अंतःकरण मे लोभ, मोहरपी चोर आये तो कुछ पणुय कीण होते है
लेिकन िोिरपी आग लगे तो हमारा तमाम जप, तप, पणुयरपी िन भसम हो जाता है | अंतः
साविान होकर िोिरपी भसमासुर से बचो | िोि का अिभनय करके फुफकारना ठीक है, लेिकन
िोिािगन तुमहारे अतःकरण को जलाने न लगे, इसका धयान रखो |

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